धर्मेन्द्र कुमार लाठ पूर्णिया ब्यूरो
पूर्णिया। पूर्णिया के सुखसेना गांव में पिछले करीब 300 वर्षों से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व पारंपरिक तरीके से मनाया जा रहा है। बीती रात ठीक 12 बजकर 59 मिनट पर भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाया गया। जन्म के समय मंदिर परिसर में भक्तिमय माहौल बन गया और भगवान श्रीकृष्ण के जयकारों से पूरा वातावरण गूंज उठा।
देवकी की गोद से यशोदा की गोद में पहुंचे कान्हा
जन्माष्टमी के मुख्य आयोजन के दौरान यहां की पारंपरिक धार्मिक विधि के तहत भगवान श्रीकृष्ण को माता देवकी की गोद से माता यशोदा की गोद में सौंपा गया। इस दृश्य को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। जन्मोत्सव के दौरान भक्तों ने पूजा-अर्चना कर भगवान श्रीकृष्ण से सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना की।
चांदी की बांसुरी चढ़ाने की अनोखी परंपरा
सुखसेना की जन्माष्टमी की सबसे खास पहचान यहां की चांदी की बांसुरी चढ़ाने की परंपरा है। यहां छोटे-छोटे बच्चों द्वारा भगवान श्रीकृष्ण को चांदी की बांसुरी अर्पित की जाती है।स्थानीय ग्रामीण किशोर कुमार मिश्रा, कमलानंद झा और अशोक कुमार झा ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण को बांसुरी अत्यंत प्रिय मानी जाती है। इसी आस्था के चलते बच्चों द्वारा भगवान को चांदी की बांसुरी चढ़ाई जाती है।ग्रामीणों के अनुसार, जिन बच्चों के माता-पिता की मनोकामना पूरी होती है, वे दूर-दराज के क्षेत्रों से सुखसेना पहुंचकर भगवान श्रीकृष्ण को चांदी की बांसुरी अर्पित करते हैं। स्थानीय मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण को बांसुरी अर्पित करने से बच्चों पर उनका आशीर्वाद बना रहता है और बच्चे प्रतिभाशाली बनते हैं।
50 से 200 रुपये तक उपलब्ध होती है चांदी की बांसुरी
श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पूजा समिति की ओर से 50 रुपये से लेकर 200 रुपये तक में चांदी की बांसुरी उपलब्ध कराई जाती है। बच्चे अपनी श्रद्धा के अनुसार बांसुरी लेकर भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित करते हैं।यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और जन्माष्टमी के दौरान सुखसेना आने वाले श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
सांस्कृतिक कार्यक्रम और जागरण बने आकर्षण
जन्माष्टमी के अवसर पर गांव में भजन-कीर्तन, जागरण और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है। इन कार्यक्रमों में स्थानीय युवा मंडली के साथ-साथ बड़ी संख्या में ग्रामीण हिस्सा लेते हैं।पूरे गांव में भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति का माहौल बना हुआ है। बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग और युवा सभी जन्माष्टमी के आयोजन में उत्साह के साथ भाग लेते हैं।
तीन दिवसीय भव्य मेला भी आयोजित
जन्माष्टमी के अवसर पर सुखसेना में तीन दिवसीय भव्य मेले का भी आयोजन किया जाता है। मेले में विभिन्न प्रकार की दुकानें, बच्चों के लिए झूले और मनोरंजन के अन्य साधन श्रद्धालुओं एवं ग्रामीणों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।स्थानीय लोगों का कहना है कि सुखसेना की जन्माष्टमी केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि करीब तीन शताब्दियों से चली आ रही आस्था, परंपरा और ग्रामीण संस्कृति का प्रतीक है। हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचकर भगवान श्रीकृष्ण का आशीर्वाद लेते हैं और चांदी की बांसुरी चढ़ाने की परंपरा में शामिल होते हैं।








