पूर्णिया | कोनेन रजा
पूर्णिया। हाथों में हुनर, आंखों में सपने और मन में परिवार के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा—पूर्णिया की बेटी पूजा कुमारी की कहानी मेहनत, आत्मनिर्भरता और पारिवारिक जिम्मेदारी की एक प्रेरक मिसाल है। जिस उम्र में युवा अपने भविष्य के सपने संवारते हैं, उसी उम्र में पूजा अपने हुनर से देवी-देवताओं की आकर्षक प्रतिमाएं गढ़ने के साथ परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों में पिता का हाथ बंटा रही हैं।
मां शारदा, मां दुर्गा, मां काली, मां वैष्णो देवी, बजरंगबली और मां सरस्वती की प्रतिमाओं को आकार देने वाली पूजा के लिए मूर्तिकला सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि परिवार की आजीविका और अपनी पहचान बनाने का जरिया भी है। करीब दस वर्षों से अपने पिता के साथ मूर्ति निर्माण में जुटी पूजा अब इस कला में अच्छी पकड़ बना चुकी हैं।
पिता बने गुरु, बेटी ने हुनर को बनाया ताकत
पूजा के पिता रामू मूर्तिकार पिछले करीब 20 वर्षों से मूर्ति निर्माण के कार्य से जुड़े हैं। वह ग्राहकों की पसंद और उनके ऑर्डर के अनुसार विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं तैयार करते हैं। इसी कला के बीच पूजा ने भी अपने पिता से मूर्तिकला की बारीकियां सीखीं। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उन्होंने पिता के काम में हाथ बंटाना शुरू किया। धीरे-धीरे उनका हुनर निखरता गया और आज वह खुद भी विभिन्न प्रतिमाओं को आकार देने में सक्षम हैं।
पूजा की कहानी बताती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, मेहनत और सीखने की लगन से रास्ते निकाले जा सकते हैं। पिता के अनुभव और अपने अभ्यास के दम पर पूजा पारंपरिक मूर्तिकला को आगे बढ़ाने में योगदान दे रही हैं।
एक परिवार, एक हुनर और जिम्मेदारियों की साझा लड़ाई
रामू मूर्तिकार का परिवार केवल आजीविका चलाने के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी कला को जीवित रखने के लिए भी मिलकर काम करता है। उनकी दूसरी बेटी आरती कुमारी स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद पिता के काम में सहयोग कर रही हैं। तीसरी बेटी पुष्पा कुमारी भी मूर्ति निर्माण में हाथ बंटाती हैं। वहीं, बेटे शिवम् और सुंदरम भी परिवार के इस काम में अपना योगदान देते हैं।
इस तरह पूरा परिवार एक साथ मिलकर प्रतिमाएं तैयार करता है और अपने हुनर के सहारे आर्थिक चुनौतियों का सामना करता है। रामू मूर्तिकार को उनकी कला के लिए कई बार पुरस्कार और सम्मान भी मिल चुके हैं।
पूजा की मेहनत में छिपा है आत्मनिर्भरता का संदेश
पूजा कुमारी की यह पहल उन बेटियों के लिए प्रेरणा है, जो अपनी प्रतिभा के दम पर परिवार का सहारा बनना चाहती हैं। उन्होंने साबित किया है कि बेटियां केवल परिवार की जिम्मेदारियों को समझती ही नहीं, बल्कि अपने हुनर, मेहनत और आत्मविश्वास से उन्हें निभाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
पूर्णिया की इस बेटी की कहानी मिट्टी से मूर्तियां बनाने तक सीमित नहीं है। यह कहानी उस मेहनत की है, जो परिवार के सपनों को आकार देती है; उस आत्मविश्वास की है, जो मुश्किल परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने की राह दिखाता है, और उस बेटी की है, जिसने अपने हाथों के हुनर को परिवार की ताकत बना दिया है।







