गढ़बनैली के 125 साल पुराने दुर्गा मंदिर में तांत्रिक विधि से होती है मां की आराधना, सात सौ मंत्रों के विशेष विधान से है मंदिर की अलग पहचान राजघराने की परंपरा आज भी कायम

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धर्मेन्द्र कु लाठ पूर्णिया 

कसबा (पूर्णिया)। सीमांचल की धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत में गढ़बनैली स्थित मां दुर्गा मंदिर का विशेष स्थान है। करीब 125 वर्ष पुराने इस मंदिर में मां दुर्गा की आराधना पारंपरिक तांत्रिक विधि और विशेष अनुष्ठानों के साथ की जाती है। यहां की विशिष्ट पूजा पद्धति, मंत्रोच्चारण, हवन और साधना की परंपरा मंदिर को क्षेत्र के अन्य पूजा स्थलों से अलग पहचान देती है। नवरात्र के अवसर पर मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है और दूर-दराज के क्षेत्रों से भक्त मां दुर्गा के दर्शन के लिए पहुंचते हैं

बताया जाता है कि इस प्राचीन मंदिर की स्थापना गढ़बनैली के राजा रामानंद सिंह ने कराई थी। राजघराने से जुड़ी इस धार्मिक परंपरा का निर्वहन पीढ़ियों से होता आ रहा है। मंदिर की पूजा पद्धति को व्यवस्थित रूप देने में आचार्य ताराचरण शर्मा, शनिनाथ शर्मा, मुरलीधर शर्मा और कालीचरण शर्मा की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है।

परंपरा के अनुसार, इन विद्वानों ने विचार-विमर्श के बाद पूजा विधान और मंत्रों को संकलित किया था। आज भी इस विशिष्ट पूजा पद्धति के कारण मंदिर की अलग पहचान बनी हुई है।

सात सौ मंत्रों के विधान से होती है विशेष पूजा

गढ़बनैली दुर्गा मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां की पारंपरिक तांत्रिक पूजा पद्धति है। बताया जाता है कि यहां दुर्गा उपासना कल्पद्रुम पर आधारित विधान के अनुसार पूजा-अर्चना की जाती है। इस दौरान सात सौ मंत्रों के उच्चारण, हवन और कठिन विलोम पाठ का विशेष महत्व है। विलोम पाठ में मंत्रों का उल्टे क्रम में उच्चारण किया जाता है, जिसके लिए साधना, एकाग्रता और विशेष अभ्यास की आवश्यकता होती है।

मंदिर की परंपरा में प्रत्यंगिरा जप एवं स्तोत्र तथा ऋषि-परंपरा से जुड़े मंत्रों के उच्चारण का भी उल्लेख मिलता है। इन अनुष्ठानों के दौरान साधक पूरे विधि-विधान और अनुशासन के साथ मां दुर्गा की आराधना में जुटे रहते हैं। नवरात्र के नौ दिनों में मंदिर परिसर में विशेष धार्मिक वातावरण बना रहता है।

बगलामुखी और शीतला जप की भी विशेष परंपरा

मंदिर की पूजा परंपरा में बगलामुखी और शीतला जप का भी विशेष महत्व बताया जाता है। परंपरा के अनुसार, इन अनुष्ठानों में शामिल कुछ साधक नौ दिनों तक पीले वस्त्र धारण करते हैं और पीले रंग से संबंधित भोजन ग्रहण करने के नियम का पालन करते हैं। इन धार्मिक अनुष्ठानों को साधना, अनुशासन और आस्था से जोड़कर देखा जाता है।

आस्था के साथ राजघराने की विरासत का प्रतीक

गढ़बनैली का दुर्गा मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत और राजघराने की पुरानी धार्मिक परंपराओं का प्रतीक भी है। वर्षों से चली आ रही पूजा पद्धति के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है। नवरात्र के दौरान भक्त मां दुर्गा के दर्शन कर सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।

करीब सवा सौ वर्षों से चली आ रही इस परंपरा ने गढ़बनैली दुर्गा मंदिर को सीमांचल के प्रमुख धार्मिक स्थलों में विशिष्ट पहचान दिलाई है। प्राचीन पूजा विधान, तांत्रिक साधना और राजघराने की विरासत के कारण यह मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।

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