धर्मेंद्र कु लाठ पूर्णिया ब्यूरो
पूर्णिया आकाशवाणी केंद्र पर हिंदी पखवाड़ा का समापन समारोह आयोजित किया गया। भारत सरकार के गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग के तत्वावधान में आयोजित इस पखवाड़े के दौरान विभिन्न हिंदी प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया
समापन समारोह में प्रतियोगिताओं में प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में पूर्णिया विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्राध्यापक सहित बड़ी संख्या में हिंदी प्रेमी और प्रतिभागी मौजूद रहे।
शिवाजी झा ने हिंदी के निरंतर विकास पर दिया जोर
इस मौके पर आकाशवाणी पूर्णिया के कार्यक्रम अधिशासी एवं राजभाषा अधिकारी शिवाजी झा ने हिंदी के प्रति निरंतर प्रयास किए जाने पर जोर दिया।
उन्होंने बताया कि हिंदी पखवाड़े के दौरान 15 दिनों तक अलग-अलग वर्गों में कई प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। इनमें प्रारूप एवं टिप्पणी लेखन, निबंध लेखन सहित विभिन्न विधाओं की प्रतियोगिताएं शामिल रहीं।
शिवाजी झा ने कहा कि प्रतियोगिताओं के माध्यम से कर्मचारियों और प्रतिभागियों को हिंदी में अपनी रचनात्मकता और लेखन क्षमता को सामने रखने का अवसर मिला। समापन के अवसर पर सभी सफल प्रतिभागियों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।
‘सिर्फ पखवाड़ा नहीं, हर दिन हिंदी के विकास पर हो काम’
शिवाजी झा ने हिंदी के विकास को लेकर कहा कि हिंदी के विकास के लिए हम सभी को सतत प्रयास करना चाहिए। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि हिंदी के प्रति प्रयास केवल हिंदी पखवाड़े तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि हर दिन हिंदी के विकास और प्रचार-प्रसार के लिए काम किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि राजभाषा हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने में ऐसे आयोजनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। प्रतियोगिताओं और सम्मान समारोह के माध्यम से हिंदी के प्रति रुचि और सकारात्मक वातावरण को बढ़ावा मिलता है।
प्रतिभागियों को किया गया सम्मानित
समापन समारोह में विभिन्न प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को मंच पर सम्मानित किया गया। प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त प्रतिभागियों को प्रशस्ति पत्र प्रदान किए गए।
कार्यक्रम में मौजूद हिंदी प्रेमियों और प्राध्यापकों ने भी हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग और इसके विकास की दिशा में निरंतर प्रयास की आवश्यकता पर जोर दिया।
आकाशवाणी पूर्णिया में आयोजित हिंदी पखवाड़े का समापन भले ही हो गया, लेकिन शिवाजी झा का संदेश साफ रहा कि हिंदी के विकास का प्रयास किसी एक पखवाड़े तक सीमित नहीं, बल्कि साल के हर दिन जारी रहना चाहिए।







